क्रिया ही उपनिषद् है एवं उपनिषद् ही क्रिया है | मूल क्रिया की गणना योगभक्तिपरक विज्ञान के पारिभाषिक विषयों में की जाती रही है | सत्यपथगामी साधक इस गुह्य पदार्थ विज्ञान की अन्तर्निहित जटिलताओं के फलस्वरूप प्रायः दिग्भ्रमित हो जाते हैं |
इस पुस्तक की रचना का आधार अन्तःपुर में 'निरालम्बोपनिषद्' के गूढ़ अर्थों एवं अलौकिक अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन है। इस पारलौकिक स्पंदन को लेखनी में समाहित करना अति दुष्कर होता अगर ये कार्य सिद्ध साधन निर्देशित न होता। अनिर्वचनीय, अलौकिक एवं अद्भुत आनंद से परिपूर्ण इस साधना यात्रा में मूल क्रिया साख्य भाव दर्शित तथा सम्पूर्ण समर्पण के आभिर्भावभूत लक्षित हुई। इसी विशिष्ट अवस्था की समग्रता का...